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Saturday, May 02, 2020

कविता: प्रियदर्शिनी सिंह

हे मातृभूमि!हे जगत जननि माँ, आज मन बहुत ही क्षुब्ध है,
कुछ एक भाई हैं सहिष्णु कुछ कट्टरता की मूरत हैं,
क्यों न समझे कोई इस दुनिया में मानवता की जरूरत है,
कोई देश जला कर स्वयं राजा बनने की सोच रहा, 
कोई चुप रहने की इल्लत(आदत) से माँ घर से अब तक दूर रहा,
कुछ नोच रहे लाडो को कोई बीच सड़क जलाता है,
अपराध देखने से पहले जाति देखा जाता है,
कोई अपराधियों को बचा रहा कोई मानव बम बना रहा,
कोई विद्या मंदिर जला रहा कोई आदर्शों को निभा रहा,
फिजाओं में विष घुला हुआ संवादों में जहर टपकते हैं,
कोई चिर निद्रा में पड़ा हुआ कोई बेवजह ही जगा रहा, 
कोई प्यार की गीतें गाता है कोई नफरत की गजल सुना रहा,
कोई राजधानी जला रहा कोई घुसपैठियों को बचा रहा,
अपनी-अपनी डफली हर कोई अपनी धुन में बजा रहा,
सत्ता मोह,और लोभ निरंतर देश प्रेम को मिटा रहा,
मानवता चित्कार रही दानवदल के प्रहार से 
कोई वीर तो जनो माँ जो इनका संहार करे
महाराणा या वीर शिवाजी या गोडसे ही।
      प्रियदर्शिनी सिंह

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