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Monday, January 16, 2023

                             Hanuman chalisa



दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥

राम दूत अतुलित बल धामा
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥२॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा
कानन कुंडल कुँचित केसा॥४॥

हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे
काँधे मूँज जनेऊ साजे॥५॥


शंकर सुवन केसरी नंदन
तेज प्रताप महा जगवंदन॥६॥

विद्यावान गुनी अति चातुर
राम काज करिबे को आतुर॥७॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया
राम लखन सीता मनबसिया॥८॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा
विकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे
रामचंद्र के काज सवाँरे॥१०॥

लाय सजीवन लखन जियाए
श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥११॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई
तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई॥१२॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावै
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥१३॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा
नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥१५॥

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना
लंकेश्वर भये सब जग जाना॥१७॥

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू
लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥१८॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही
जलधि लाँघि गए अचरज नाही॥१९॥

दुर्गम काज जगत के जेते
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥

राम दुआरे तुम रखवारे
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥

सब सुख लहैं तुम्हारी सरना
तुम रक्षक काहु को डरना॥२२॥

आपन तेज सम्हारो आपै
तीनों लोक हाँक तै कापै॥२३॥

भूत पिशाच निकट नहि आवै
महावीर जब नाम सुनावै॥२४॥

नासै रोग हरे सब पीरा
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥

संकट तै हनुमान छुडावै
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥२६॥

सब पर राम तपस्वी राजा
तिनके काज सकल तुम साजा॥२७॥

और मनोरथ जो कोई लावै
सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥

चारों जुग परताप तुम्हारा
है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥

साधु संत के तुम रखवारे
असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता
अस बर दीन जानकी माता॥३१॥

राम रसायन तुम्हरे पासा
सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥

तुम्हरे भजन राम को पावै
जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥

अंतकाल रघुवरपुर जाई
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥

और देवता चित्त ना धरई
हनुमत सेई सर्व सुख करई॥३५॥

संकट कटै मिटै सब पीरा
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥

जै जै जै हनुमान गुसाईँ
कृपा करहु गुरु देव की नाई॥३७॥

जो सत बार पाठ कर कोई
छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥

जो यह पढ़े हनुमान चालीसा
होय सिद्ध साखी गौरीसा॥३९॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा
कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥४०॥

दोहा

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥


Wednesday, November 11, 2020

भोजन से पहले इस मंत्र का करे उच्चारण, कभी भूखे नहीं रहेंगे। हमेशा धन भरा रहेगा।

भोजन मंत्र

मनुष्य हो या कोई जीव, सभी के लिए 3 चीज अती आवश्यक है। एक वायु स्वास के लिए, जल और भोजन।  इन वस्तुओं को अगर स्वक्षता से लिया जाए तो शरीर और चित प्रसन्न रहता है। शरीर स्वस्थ रहता है। मुखारविंद तेजमय रहता है। 

 भोजन ग्रहण करने से पहले अन्नदाता को प्रसन्न में से धन्यवाद करना चाहिए क्युकी जिस समय आप भोजन कर रहे होते हैं ना जाने कितने लोग भूखे होते हैं। अतः कभी भी भोजन करने से पहले नैवेद्य देकर नीचे लिखे हुए मंत्र को पढ़कर और। परमात्मा को धन्यवाद् करके ही भोजन करना चाहिए।

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना।।

ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु।
मा विद्‌विषावहै॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

Sunday, November 08, 2020

अयोध्या में भव्य डिजिटल दीपावली की तैयारी।

दीपावली को यादगार बनाने के लिए अयोध्या में पहली बार होगा भव्य डिजिटल दीपावली की तैयारी।

500 वर्षों में पहली बार रामजन्मभूमि पर दिवाली के अवसर पर इस बार UP की योगी सरकार भव्य डिजिटल दीपावली मनाने की तैयारी कर रही है। दीपावली को यादगार बनाने के लिए योगी सरकार तैयारी में जुट गई है। दिवाली के मौके पर अयोध्या में पहली बार डिजिटल आतिशबाजी होगी। वहीं अयोध्या में भक्तों के दीप जलाने का भी इंतजाम किया जाएगा। इस बार लेजर शो के जरिए सरयू तट पर आतिशबाजी होगी। वहीं योगी सरकार अयोध्या में पहली बार वर्चुअल दीपोत्सव का आयोजन करेगी। वर्चुअल दीपोत्सव के लिए जल्द ही नई वेबसाइट लांच होगी। ये वर्चुअल दीपोत्सव रियल जैसा ही अनुभव देगा। वहीं दीप जलाने के बाद धन्यवाद पत्र मिलेगा। यह अनूठा वर्चुअल दीपोत्सव बिल्कुल वास्तविक जैसा लगेगा।



पोर्टल पर श्रीरामलला विराजमान की तस्वीर होंगी। जिसके समक्ष वर्चुअल दीप प्रज्वलन होगा। यहां सुविधा होगी कि श्रद्धालु अपने भावानुसार मिट्टी, तांबे, स्टील और किसी अन्य धातु के दीप स्टैंड का चयन कर सकें। घी, सरसों और तिल के तेल का विकल्प भी उपलब्ध होगा।वहीं श्रद्धालु अगर पुरुष है तो पुरुष के वर्चुअल हाथ और महिला होने पर महिला के वर्चुअल हाथ दीप प्रज्ज्वलित करेंगे। दीप जलाने के बाद श्रद्धालु के विवरण के आधार पर रामलला की तस्वीर के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से धन्यवाद-पत्र भी जारी होगा। 13 नवम्बर को प्रस्तावित मुख्य समारोह से पूर्व यह वेबसाइट आमजन के लिए उपलब्ध हो जाएगी।

इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दीपोत्सव में वर्चुअली सहभागिता कर रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी रामायण के प्रसंगों पर आधारित झांकियों का अवलोकन करेंगे। साथ ही श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के स्वरूप की आरती कर श्रीराम का राज्याभिषेक करेंगे। मुख्यमंत्री जन्मभूमि परिसर में रामलला की आरती भी उतारेंगे।

Thursday, October 29, 2020

जनरल डायर ' लीपि सिंह ' का गुरूर चकनाचूर, धू धू कर जल रहा अभिमान और ऑफिस

मुंगेर। बिहार।। जनरल डायर ' लीपि सिंह ' का गुरूर चकनाचूर, धू धू कर जल रहा अभिमान और ऑफिस

विजयदशमी के दिन मुंगेर ने एक बार फिर से जनरल डायर को देखा। जी हा 1919 के बाद फिर से भारत के इतिहास ने अपने आप को दोहराया, जहां निहत्थे, मासूम और बेकसूर भक्तो पर कुछ पुलिस वालो ने अंधाधुंध 25 राउंड गोलियां बरसाई। जी हा 25 राउंड।। ये जनरल डायर कोई अंग्रेज़ नहीं भारतीए है और इसका नाम है SP लिपि सिंह। इसके पिता जी सांसद है और इसे उसका ही अभिमान ही गया था। लेकिन विराट महारानी सबकी माता मा दुर्गा के सामने सबका अहंकार चुर चूर हो जाता है। और आज अर्थात 29 अक्टुबर को यही हुआ।

      विजयदशमी के दिन जब एक युवक की मृत्यु हुई और 6 युवक घायल हुए उसके बाद से ही मुंगेर के सड़कों पर डायर के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए थे। धीरे धीरे हिन्दू अस्मिता भी जगी। और तकरीबन 800 लोग अलग अलग चौराहों पर धरना दे रहे थे। लेकिन प्रशासन की नींद ही नहीं टूट रही थी। फिर जनता का आक्रोश बढ़ा और भीड़ ने लिपि सिंह के ऑफिस को जला कर राख कर डाला।।  जिस कुर्सी पर बैठ कर उसने है आदेश दिया होगा, वह कुर्सी जल के ख़ाक में मिल गई होगी और ऐसे ही लिपि सिंह का अभिमान भी।
भारत के इतिहास में इन दोनों जनरल डायर को हमेशा याद किया जाएगा और हमेशा दोनों का नाम लेने के बाद थूका जाएगा।।

 वैसे अभी अभी प्राप्त जानकारी के अनुसार लिपि सिंह को बर्खास्त कर दिया गया है।
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अगर आप भी लिखने में interested हैं तो हमें मेसेज करे।

Wednesday, October 21, 2020

माँ बलहेश्वरी की आरती

भगवती स्तुती

यंत्र न मंत्र न तंत्र कछु ,नहीं जानत योग समाधि विचारों
वेद सुदर्शन ना जानत नाही,  पुरान प्रमाण विधान सुधारो
 जौं मिथिला न रहे जननी, न रहे कछु ले ससुधर्म प्रचारो
 और उपाय न देख ही परे, अवलंब हमें एक पाव तिहारो
 अपराधो भवत्येव तनयस्य पदे पदे
कोऽरऽः  सहस्त्रे लोके केवलं मातरं बिना
आवाहनं न  जानामि न जानामि विसर्जन
 पूजा विधि ना जानामि क्षमस्व परमेश्वरी
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु॥१२॥

      
    अथ देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्॥१॥
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥२॥
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥३॥
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥४॥
परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्॥५॥
श्वापाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ॥६॥
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः॥८॥
       
     नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
      किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः।
      श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
      धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव॥९॥
    
       आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
      करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।
      नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
      क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति॥१०॥
 
      जगदम्ब विचित्रमत्र किं
      परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि।
        अपराधपरम्परापरं
      न हि माता समुपेक्षते सुतम्॥११॥


    मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि।
     एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु॥१२॥
       ##इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितं##

               श्री देवीजीकी आरती

जगजननी जय ! जय ! माँ ! जगजननी जय ! जय !
भयहारिणि, भवतारिणि, भवभामिनि जय ! जय !! जगo
तू ही सत-चित-सुखमय शुद्ध ब्रह्मरुपा ।
सत्य सनातन सुन्दर पर-शिव सुर-भूपा ।।1।। जगo
आदि अनादि अनामय अविचल अविनाशी । 
अमल अनन्त अगोचर अज आनँदराशी ।।2।। जगo
अविकारी, अघहारी, अकल, कलाधारी ।
कर्त्ता विधि, भर्त्ता हरि, हर सँहारकारी ।।3।। जगo
तू विधिवधु, रमा, तू उमा, महामाया ।
मूल प्रकृति विद्या तू, तू जननी, जाया ।।4।। जगo
राम, कृष्ण तू, सीता, व्रजरानी राधा ।
तू वाण्छाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा ।।5।। जगo
 दश विद्या, नव दुर्गा, नानाशस्त्रकरा ।
अष्टमातृका, योगिनि, नव नव रूप धरा ।।6।। जगo
तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू ।
तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू ।।7।। जगo
सुर-मुनि-मोहिनि सौम्या तू शोभाssधारा ।
विवसन विकट-सरुपा, प्रलयमयी धारा ।।8।। जगo
तू ही स्नेह-सुधामयि, तू अति गरलमना ।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि-तना ।।9।। जगo
मूलाधारनिवासिनि, इह-पर-सिद्धिप्रदे ।
कालातीता काली, कमला तू वरदे ।।10।। जगo
शक्ति शक्तिधर तू ही नित्य अभेदमयी ।
भेदप्रदर्शिनि वाणी विमले ! वेदत्रयी ।।11।। जगo
हम अति दीन दुखी मा ! विपत-जाल घेरे ।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे ।।12।। जगo
निज स्वभाववश जननी ! दयादृष्टि कीजै ।
करुणा कर करुणामयि ! चरण-शरण दीजै ।।13।। जगo

            क्षमा प्रार्थना

अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेहर्निशं मया।
दासोयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्‌।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत।
यां गतिं सम्वाप्नोते न तां बह्मादयः सुराः॥
सापराधो स्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके।
इदानीमनुकम्प्योहं यथेच्छसि तथा कुरु॥
अक्षानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्नयूनमधिकं कृतम्‌ ॥
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि॥
कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रेहे।
गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि॥
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतमं जपम्‌।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि॥

              देवीमयी 

तव  च  का  किल  न स्तुतिरम्बिके
            सकलशब्दमयी किल ते तनुः ।
निखिलमुर्तिषु    मे      भवदन्वयो
            मनसिजासु बहिः प्रसरासु च  ।।
इति विचिन्त्य शिवे ! शमिता  शिवे !
            जगतिजातमयत्न वशादिदम् ।
स्तुतिजपार्चन    चिन्तन   वर्जित
             न खलु काचन काल कलास्ति मे ।।

Tuesday, October 20, 2020

शाहपुर में भव्यता से हो रहा दुर्गा पूजा का आयोजन

       भव्यता से हो रहा दुर्गा पूजा का आयोजन

      पंडौल! प्रखंड के गाँव शाहपुर भव्य दुर्गा पूजा के लिए जाना जाता है, यहां के भव्यता का पता इसी बात से चलता है कि यहां आज़ादी से पहले से पूजा हो रही है। प्रखंड के सबसे प्राचीन पूजा में सुमार, यहां 1941 से ही हर साल दर्जनों देवी देवताओं सहित होती है माँ दुर्गा के प्रतिमा की स्थपना। 
शुरुआत में फुस के मंदिर में होता था पूजा, अब बन गया है भव्य मंदिर। 

           यहां गाँव के दर्जनों पंडितों तथा ग्रामीणों के सहयोग से वैदिक विधि से होती आ रही पूजा।। 


         यहां का पूजा विधि, मंत्रोच्चार एवं जाप सबका मन मोह लेता है। यहां स्थापित माँ के प्रति भक्तों की श्रद्धा एवं विस्वास इतनी है कि यहां दूर दूर से श्रद्धालु माँ के दर्शन पूजा के लिए आते हैं। 
                 

                 जहाँ हर जगह कोरोना महामारी तथा लॉकडाउन के कारण इस साल आयोजन पहले की तरह नहीं हो पा रहा है, वही शाहपुर का पूजा इस साल पहले से भी भव्य बन चूका है। आयोजन समिति के अध्यक्ष इस वर्ष अपने हाथ पर जयंती गिराने का संकल्प लिए है, इस साल अध्यक्ष श्री गोपाल जी झा समाज कल्याण के भावना से पुरे नवरात्रा अन्न जल त्यागने के साथ मंदिर में अपने हाथ पर जयंती गिराने का काम किये है। हाथ पर जयंती गिराने के संकल्प से ग्रामीणों सहित पुरे इलाके में खुशी का माहौल बना हुआ है। 


        सरकारी गाइडलाइन का हो रहा पालन :
कोरोना महामारी के चलते सरकार के तरफ से दुर्गा पूजा संबंधित कई तरह का नियम बनाया गया है आयोजक समिति के द्वारा नियमों के पालन करने का पूरा कोशिस किया जा रहा है। जहाँ एक तरफ मेला में मास्क लगाना अनिवार्य है वहीं शारीरक दुरी बनाने का भी प्रयास किया जा रहा है। इस साल समिति के द्वारा किसी भी तरह का सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं कराने का फैसला लिया गया है। 


              
    समिति के सचिव जीतेन्द्र झा का कहना है कि समिति सरकारी गाइडलाइन के तहत दुर्गा पूजा के सफल आयोजन कराने में सक्षम है। वहीं मंदिर के पंडित महाचंद्र ठाकुर, सुरेंद्र झा का कहना है माँ दुर्गा ही हमें इस भयंकर महामारी से भी राहत देगी।

दुर्गा पूजा की रौनक में डूबा बलहा गांव


 आज जब पूरा विश्व कोरोना महामारी से त्राहिमाम कर रहा है तब बलहा गांव पूरे हर्सोल्लास के साथ दुर्गा पूजा के आनंद में डूबा हुआ है। पटना हाईकोर्ट से पूजा में राहत मिलने के बाद बिहार के हर गांव में दुर्गा पूजा की रौनक बढ़ गई है। एक तरफ जहां कलश स्थापन के दो दिन पूर्व तक सरकार के तालिबानी फरमान के कारण लोगो में आक्रोश के साथ साथ पूजा व्यवस्था को लेकर असमंजस था वहीं पटना हाईकोर्ट के आदेश के बाद लोगो में खुशी की लहर दौड़ गई।

            ज्ञात हो  की बलहा में इस बार दुर्गा पूजा करते हुए 104 साल हो गए हैं। हर वर्ष की भांति बार     भी धूम धाम से पूजाा करते हुए लोग भक्ति में  लीन  हैं।  बलहा में निवास   करने वाली माता को     बल्हेश्वरी  मा के नाम से  जाना जाता है।  श्री पप्पू झा की अध्यक्षता    में आयोजित होने वाली मा   बल्हेश्वरी  की मे पूजा अर्चना की शुरुआत 1917 ई में हुुई   ।  100  वर्षो से पूजा होने के कारण मान्यता के अनुसार यह   सिद्ध पीठ हो गया है और मा बल्हेश्वरी  भक्तों की    हर  मनोकामना पूर्ण करती है।   

             आपको बताते चले की बलहा बिहार के मधुबनी जिले में कराहिया पूर्वी पंचायत में पड़ता है। यहां का पूजा अपने इतिहास और वैदिकी पूजा को लेकर भी प्रचलित है।

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Sunday, October 18, 2020

देव्यापराधक्षमा स्तोत्रम

न मत्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो


न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।



न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं


परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्


विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया


विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।


तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे


कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति


पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः


परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।


मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे


कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति


जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता


न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।


तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे


कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति


परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया


मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।


इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता


निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्


श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा


निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।


तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं


जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ


चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो


जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।


कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं


भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्


न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे


न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।


अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै


मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः


नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः


किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।


श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे


धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव


आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं


करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।


नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः


क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति


जगदम्ब विचित्रमत्र किं


परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।


अपराधपरम्परापरं


न हि माता समुपेक्षते सुतम्

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।


एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु।।


Saturday, October 17, 2020

जग जननी जय जय।। दुर्गा आरती।।

 जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय!


भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय। जगजननी…
तू ही सत्-चित्-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा।
सत्य सनातन, सुन्दर पर-शिव सुर-भूपा॥ जगजननी…
आदि अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी।
अमल, अनन्त, अगोचर, अज आनन्दराशी॥ जगजननी…
अविकारी, अघहारी, अकल कलाधारी।
कर्ता विधि, भर्ता हरि, हर संहारकारी॥ जगजननी…
तू विधिवधू, रमा, तू उमा महामाया।
मूल प्रकृति, विद्या तू, तू जननी जाया॥ जगजननी…
राम, कृष्ण तू, सीता, ब्रजरानी राधा।
तू वांछाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा॥ जगजननी…

दश विद्या, नव दुर्गा नाना शस्त्रकरा।
अष्टमातृका, योगिनि, नव-नव रूप धरा॥ जगजननी…
तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू।
तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू॥ जगजननी..
सुर-मुनि मोहिनि सौम्या, तू शोभाधारा।
विवसन विकट सरुपा, प्रलयमयी, धारा॥ जगजननी…
तू ही स्नेहसुधामयी, तू अति गरलमना।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि तना॥ जगजननी…
मूलाधार निवासिनि, इह-पर सिद्धिप्रदे।
कालातीता काली, कमला तू वरदे॥ जगजननी…
शक्ति शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी।
भेद प्रदर्शिनि वाणी विमले! वेदत्रयी॥ जगजननी…
हम अति दीन दु:खी माँ! विपत जाल घेरे।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे॥ जगजननी…
निज स्वभाववश जननी! दयादृष्टि कीजै।
करुणा कर करुणामयी! चरण शरण दीजै॥ जगजननी मां…

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