नहीं रहे मसाला किंग धर्मपाल गुलाटी , जानिये उनके संघर्षो की कहानी
हम अकेले चल दिए थे जानिबे मंजिल ,
लोग मिलते गए करवा बनता गया !
महासिया दी हिट्टी अर्थात M.D.H.
असली मसाले सच सच ,
M.D.H. , M.D.H. !
पाकिस्तान के सियालकोट में चुन्नीलाल गुलाटी के घर सन 1932 एक बच्चा पैदा हुआ, नाम रखा गया धर्मपाल गुलाटी।
वहीं धर्मपाल गुलाटी जो पांचवीं भी पास ना कर सका। पिताजी ने अलग अलग जगह नौकरी लगवाई। कभी बढ़ई के यह तो कभी परचून की दुकान में। लेकिन कहीं भी धर्मपाल का में नहीं लगता था। पहलवानी का शौक था लेकिन उससे क्या हो जाता? साथ साथ मेे श्रीमान कबूतरबाजी और पतंगबाजी भी किया करते थे। लेकिन पढ़ाई मेे तो बिल्कुल में नहीं लगता था। पढ़ाई छोड़ने के बाद धरमपाल ने 8 महीने बढ़ई का काम किया। पिता चुन्नीलाल ने कभी साबुन की फैक्ट्री में तो कभी चावल की फैक्ट्री में काम लगवाया। कपड़े से लेकर हरवेयर तक धरमपाल ने 15 वर्ष की उम्र तक कई पापड़ बेले।। लेकिन जब बेटे का मन कहीं नहीं लगा तो पिता चुन्नीलाल ने अपने पुश्तैनी काम में अपने बेटे को भी खींच लिया।
जब धर्मपाल 18 वर्ष के हुए तो लीलावती से उनका विवाह हो गया। शादी ने तो जैसे धरमपाल की जिंदगी ही बदल दी। मौज मस्ती छोड़ कर धरमपाल अपने पुश्तैनी कामे जी जान से जुड़ गए। मिर्ची, हल्दी का पावडर अमृतसर की मंडियों से मंगाकर अपने हाथ से कूटकर एक आने दो आने और 2 रुपए की पुड़िया बेचते थे। सामान अच्छा था और ग्राहक बढ़ते गए। पूरे सियालकोट में उनके देगी मिर्च की हवा थी लेकिन तब तक देश आजाद हुआ और नेताओ के एक गलती ने हजारों लोगों को घर छोड़ने पर मजबुर कर दिया।
सियालकोट से बाकी हिन्दुओं के साथ भागकर जब श्रीमान गुलाटी अमृतसर पहुंचे तो उनके साथ उनके भाई और बहनोई थे। जेब में 1500 रु थे। सियालकोट वाला कारोबार खत्म हो चुका था। तो 650 में एक तांगा खरीद लिया। बेकार से कुछ तो काम करते। लेकिन फिर तांगा भाई को दे दिया और खुद फिर से शुरू किया मसालों का वहीं कारोबार जो आने वाले पूरे सदी को हिला डालने वाला था। और फिर समृद्धि ने अपनी रफ्तार पकड़ी और सिर्फ भारत ही नहीं देश विदेश में महासिया दी भिट्टी यानी MDH का नाम सबके जुबान पर छा गया। और धर्मपाल गुलाटी अमर हो गए।
आर्यावर्त न्यूज धर्मपाल गुलाटी जी को सादर नमन करता है और उनके आत्मा कि शांति के लिए प्रार्थना करता है। ॐ शान्ति।।
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कोई भी परेशानी हो तो बताने कि कृपा करें। नमस्कार।।